पहला अध्याय: आग का खेल
शाम के धुंधलके में, जब सूरज की आखिरी किरणें गांव के खेतों को अलविदा कह रही थीं, राधिका भाभी अपनी साड़ी के पल्लू से पसीना पोंछते हुए घर की ओर बढ़ रही थीं। उनकी चाल में एक अजीब सी मादकता थी, जो किसी को भी अपनी ओर खींच ले। 28 साल की राधिका, गांव की सबसे खूबसूरत औरतों में से एक थीं—गोरी चिट्टी, भरी हुई देह, और आंखों में एक चिंगारी जो किसी को भी जलाकर राख कर दे।
घर पहुंचते ही उनकी नजर अपने देवर, 22 साल के अर्जुन पर पड़ी, जो आंगन में मोटरसाइकिल साफ कर रहा था। अर्जुन का कसरती बदन पसीने से तरबतर था, और उसकी बनियान उसके सीने से चिपकी हुई थी। राधिका ने एक पल के लिए अपनी नजरें उस पर टिका दीं, फिर मुस्कुराते हुए बोलीं, 'अरे अर्जुन, इतना पसीना बहा रहा है, क्या मोटरसाइकिल को नहलाने का इरादा है या खुद को?'
अर्जुन ने हंसते हुए जवाब दिया, 'भाभी, ये पसीना तो बस मेहनत का है। वैसे आप भी तो खेत से लौट रही हैं, लगता है सूरज ने आपको भी नहीं बख्शा।' उसकी नजरें राधिका की साड़ी के भीगे हुए किनारे पर टिक गईं, जहां उनकी कमर की हल्की झलक दिख रही थी।
राधिका ने उसकी नजर पकड़ ली और तंज कसते हुए कहा, 'देख क्या रहे हो, देवर जी? खेत में काम करने से कपड़े गीले हो गए, या तुम्हारी नजरें ही इतनी गर्म हैं कि मुझे पिघला देंगी?'
अर्जुन ने शरारत भरे लहजे में जवाब दिया, 'भाभी, आपकी खूबसूरती के आगे तो सूरज भी शरमा जाए। मैं तो बस सोच रहा हूं कि ये गर्मी बाहर की है या अंदर की?'
राधिका ने एक कदम आगे बढ़ाया, उनकी सांसें तेज हो रही थीं। 'अर्जुन, ज्यादा चालाकी मत दिखाओ। मैं तुम्हारी भाभी हूं, लेकिन ये दिल भी तो इंसान का ही है। अगर आग लगानी है, तो बुझाने की भी तैयारी रखो।' उनकी आवाज में एक चुनौती थी, एक निमंत्रण था।
अर्जुन ने मोटरसाइकिल का कपड़ा फेंक दिया और सीधा खड़ा हो गया। उसकी आंखों में वासना की चमक थी। 'भाभी, मैं तो तैयार हूं। बताओ, ये आग कहां बुझानी है?'
राधिका ने एक गहरी सांस ली, उनकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। वो जानती थीं कि ये गलत है, लेकिन उनके शरीर में एक अजीब सी तड़प जाग रही थी। वो अर्जुन के करीब आईं, इतने करीब कि उनकी गर्म सांसें एक-दूसरे को छू रही थीं। 'अंदर चलो, देवर जी। देखते हैं तुम कितने मर्द हो।'
घर के अंदर का माहौल गर्म हो चुका था। राधिका ने दरवाजा बंद किया और अर्जुन की ओर मुड़ीं। उनकी आंखों में एक जंगलीपन था। अर्जुन ने उनकी कमर पकड़ ली, और राधिका ने कोई विरोध नहीं किया। उनकी साड़ी का पल्लू नीचे गिर गया, और अर्जुन की सांसें तेज हो गईं। 'भाभी, तुम तो आग हो। मैं जल जाऊंगा।'
राधिका ने हंसते हुए कहा, 'जलने से डरते हो तो दूर रहो। वरना ये आग तुम्हें राख कर देगी।'
उनके होंठ अब बस कुछ इंच की दूरी पर थे। अर्जुन का हाथ उनकी पीठ पर फिसला, और राधिका की सांसें और तेज हो गईं। कमरे में गर्मी बढ़ रही थी, और दोनों जानते थे कि अब रुकना नामुमकिन है।
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