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Bhabhi Ki Hawas Ki Aag

Bhabhi Ki Hawas Ki Aag

अध्याय 1: पहली मुलाकात की चिंगारी

शाम का वक्त था, और घर में एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। रिया, एक तेज-तर्रार और आत्मविश्वास से भरी महिला, रसोई में खाना बना रही थी। उसकी साड़ी उसकी कर्वी कमर को खूबसूरती से उभार रही थी, और उसकी आंखों में एक शरारत भरी चमक थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने अप्रोन उतारा और दरवाजा खोला। सामने उसका देवर, अर्जुन, खड़ा था—लंबा, चौड़े कंधों वाला, और एक मुस्कान जो किसी को भी पिघला दे।

'क्या बात है, भाभी? आज रसोई में आग लगा रही हो या दिलों में?' अर्जुन ने हंसते हुए कहा, उसकी आवाज में एक छेड़छाड़ भरा लहजा था।

रिया ने एक भौंह उठाई और मुस्कुराते हुए जवाब दिया, 'अर्जुन, तू तो बस बातों से ही आग लगा देता है। लेकिन सावधान, ये आग तुझे भी जला सकती है।'

अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया, उसकी आंखों में एक गहरी चाहत झलक रही थी। 'भाभी, मैं तो तैयार हूं जलने के लिए। बस तुम कहो तो राख तक बन जाऊं।'

रिया ने हंसते हुए उसकी ओर देखा, उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। 'बातें तो बहुत कर लेते हो, लेकिन हिम्मत है दिखाने की?' उसने चुनौती भरे लहजे में कहा, अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा सा सरकाते हुए।

अर्जुन की सांसें तेज हो गईं। उसने रिया की कमर पर हल्के से हाथ रखा, और धीरे से कहा, 'भाभी, ये हिम्मत नहीं, ये तो बस शुरुआत है।'

रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया, लेकिन उसे हटाया नहीं। उसकी आंखों में एक ज्वाला भड़क रही थी। 'अर्जुन, ये खेल खतरनाक है। अगर शुरू किया तो रुकना मुश्किल होगा।'

'मुझे रुकना पसंद नहीं, भाभी,' अर्जुन ने कहा, उसकी आवाज में एक गहरा जुनून था। वह रिया को दीवार की ओर धकेलने लगा, उसकी गर्म सांसें रिया की गर्दन पर महसूस हो रही थीं। रिया की सांसें भी तेज हो गई थीं, उसका शरीर एक अजीब सी गर्मी से भर गया था।

'अर्जुन, ये गलत है,' उसने धीरे से कहा, लेकिन उसकी आवाज में वह दृढ़ता नहीं थी।

'गलत और सही का फैसला बाद में करेंगे, भाभी। अभी तो बस ये पल है,' अर्जुन ने कहा और उसने रिया के होंठों को अपने होंठों से छू लिया। वह चुंबन इतना तीव्र था कि दोनों के शरीर में आग सी लग गई। रिया ने एक पल के लिए विरोध किया, लेकिन फिर वह भी उस जुनून में खो गई।

उनके बीच की दूरी खत्म हो गई थी। अर्जुन का हाथ रिया की कमर से नीचे सरकने लगा, और रिया की सांसें और तेज हो गईं। वह पसीने से तर हो रही थी, उसका शरीर गर्मी से तप रहा था। 'अर्जुन, रुक जा,' उसने पैंटिंग करते हुए कहा, लेकिन उसकी आंखों में वह चाहत साफ झलक रही थी।

'अब रुकना नामुमकिन है, भाभी,' अर्जुन ने कहा, उसकी आवाज में एक भूख थी। वह रिया को अपनी बाहों में उठाने ही वाला था कि तभी दरवाजे पर फिर से दस्तक हुई। दोनों एकदम से अलग हो गए, उनकी सांसें अभी भी तेज थीं, और शरीर में वह गर्मी बरकरार थी।

क्या यह पल फिर लौटेगा? या यह आग और भड़केगी? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

Want to know how it ends?

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