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शहवत की आंधी

शहवत की आंधी

अध्याय 1: मुलाकात की पहली चिंगारी

मैं, कुबरा खान, एक ऐसी औरत हूं जिसकी जिंदगी में हया और मजहबी रिवायतों की सख्त दीवारें हैं। अफगानिस्तान की धूल भरी वादियों में, मैं अपने शौहर की तीसरी बीवी हूं। मेरी खूबसूरती, मेरी लंबाई, मेरा गोरा रंग—सब कुछ एक पर्दे के पीछे छुपा है। लेकिन इस पर्दे के पीछे एक तूफान उमड़ रहा है, एक आग जो मेरे जिस्म और रूह को जला रही है। मेरा शौहर, एक बड़ा आलिम, शूरा का हिस्सा, मगर उसकी मर्दानगी उतनी ही कमजोर जितनी उसकी सोच सख्त है। उसकी नपुंसकता ने उसे कुंठित कर दिया है, और इस कुंठा का शिकार मैं और उसकी दूसरी बीवियां बनती हैं।

उस दिन, जब मैंने उससे अपनी तकलीफ बयान करने की हिम्मत की, उसने मुझे इतना मारा कि मेरे जिस्म पर नीले निशान बन गए। 'तू मुझे मर्दानगी सिखाएगी?' उसने चीखते हुए कहा। मैं चुप रही, मगर मेरे दिल में एक बगावत जाग उठी। जब दर्द बर्दाश्त से बाहर हो गया, मैंने हिम्मत जुटाई और अस्पताल पहुंची। चेहरा पर्दे में छुपाए, मैं डॉक्टर ध्रुव राठौर के सामने खड़ी थी।

'क्या तकलीफ है, बीबी?' उसकी आवाज में एक अजीब सी गहराई थी, जो मुझे झकझोर गई। उसका चेहरा, उसकी लंबी कद-काठी, और वो मांसपेशियां जो उसकी सफेद कोट के नीचे से झलक रही थीं—मैंने नजरें झुका लीं।

'बस... जिस्म में दर्द है,' मैंने हिचकिचाते हुए कहा।

'कहां? कैसे हुआ? मुझे साफ-साफ बताओ, ताकि मैं सही इलाज कर सकूं,' उसने गंभीरता से पूछा, उसकी आंखों में एक चिंता थी, जो मुझे अजीब सी राहत दे रही थी।

मगर मैं कैसे बताती? कि मेरा शौहर मुझे मारता है? कि मेरे जिस्म के निशान उसकी क्रूरता की गवाही हैं? मैं चुप रही। उसने मुझे कुछ दवाइयां दीं, मगर मेरी झूठी कहानी ने इलाज को बेकार कर दिया। रात को बुखार चढ़ गया, मेरे जिस्म में आग सी लग रही थी। मैं फिर से अस्पताल पहुंची, इस बार हालत इतनी खराब थी कि मैं मुश्किल से खड़ी हो पा रही थी।

ध्रुव ने मुझे देखते ही कहा, 'तुमने मुझे सच नहीं बताया, है ना? अब देखो, तुम्हारी हालत क्या हो गई है।'

'मैं... मैं डरती हूं,' मैंने कांपती आवाज में कहा।

'मुझसे डरने की जरूरत नहीं। मैं डॉक्टर हूं, तुम्हारी मदद करना मेरा फर्ज है। अब बोलो, क्या हुआ है?' उसकी आवाज में एक सख्ती थी, मगर उसकी आंखों में एक नरमी भी।

मैंने हिम्मत जुटाई और पर्दा हटाया। मेरे चेहरे पर, मेरे जिस्म पर बने निशान देखकर उसकी भौंहें सिकुड़ गईं। 'ये... ये किसने किया?' उसने गुस्से से पूछा।

'मेरा शौहर,' मैंने धीरे से कहा, मगर मेरी आवाज में एक ताकत थी। मैं अब चुप नहीं रहना चाहती थी।

'ये गलत है, कुबरा। तुम्हें ये बर्दाश्त नहीं करना चाहिए,' उसने कहा, उसकी आवाज में एक गहरा गुस्सा था। वो मेरे पास आया, उसने मेरे जिस्म के निशानों को देखा, उसकी उंगलियां मेरी त्वचा को छूने से पहले रुकीं। 'मैं तुम्हें चेक करूंगा, अगर तुम्हें कोई एतराज न हो।'

मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। मैंने हामी भरी। उसकी उंगलियां मेरे कंधे पर पड़ीं, और एक अजीब सी सिहरन मेरे पूरे जिस्म में दौड़ गई। उसकी सांसें मेरे करीब थीं, और मैं महसूस कर रही थी कि मेरा जिस्म गर्म हो रहा है। 'तुम्हें आराम की जरूरत है, मगर पहले ये दर्द कम करना होगा,' उसने कहा, उसकी आवाज अब नरम थी।

मैंने उसकी आंखों में देखा, और वहां एक आग देखी। मेरे अंदर भी कुछ उमड़ रहा था—एक चाहत, एक तड़प। मैंने खुद को रोका, मगर मेरे जिस्म ने बगावत कर दी। उसने मेरी बांह पकड़ी, और मुझे एक बिस्तर पर लिटाया। 'मैं तुम्हें तकलीफ नहीं होने दूंगा,' उसने वादा किया।

उसकी उंगलियां मेरे जिस्म पर फिसल रही थीं, और मैं महसूस कर रही थी कि मेरा दिल तेजी से धड़क रहा है। मैंने खुद को संभाला, मगर मेरे अंदर की औरत जाग चुकी थी। 'डॉक्टर साहब, ये... ये गलत है,' मैंने कहा, मगर मेरी आवाज में वो सख्ती नहीं थी।

'कुछ भी गलत नहीं है, कुबरा। तुम्हें जो चाहिए, वो मैं तुम्हें दे सकता हूं—राहत, सुकून, और शायद... कुछ और,' उसने मुस्कुराते हुए कहा। उसकी आंखों में एक शरारत थी, और मैं खुद को रोक नहीं पाई।

मेरे जिस्म में एक आग भड़क रही थी, और मैं जानती थी कि ये मुलाकात अब सिर्फ इलाज तक नहीं रहेगी। उसने मेरे करीब आते हुए कहा, 'तुम बहुत खूबसूरत हो, कुबरा। तुम्हें इस दर्द में नहीं रहना चाहिए।'

मेरा चेहरा लाल हो गया, और मैंने महसूस किया कि मेरे अंदर की तड़प अब बेकाबू हो रही है। उसकी सांसें मेरे गले के पास थीं, और मैं खुद को रोक नहीं पाई। ये वो पल था, जब मैंने फैसला किया कि मैं अब चुप नहीं रहूंगी—न अपने शौहर के जुल्म के सामने, और न ही अपनी चाहतों के सामने।

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