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रात की आग: एक अनकही चाहत

रात की आग: एक अनकही चाहत

अध्याय 1: नशे में खुली बातें

घर की ड्राइंग रूम में हल्की रोशनी और म्यूजिक की धीमी धुन बिखरी हुई थी। टेबल पर व्हिस्की की बोतल, ग्लास, और कुछ स्नैक्स बिखरे पड़े थे। अभिलाष, अकांक्षा और उनका दोस्त बप्पई सोफे पर बैठे हंस रहे थे। अकांक्षा का चेहरा शराब के नशे से लाल हो रहा था, उसकी हंसी में एक बेखौफ अंदाज था। अभिलाष, जो हमेशा शांत और समझदार रहता था, आज कुछ बेचैन सा लग रहा था। उसकी आंखों में एक अनकही प्यास थी, जो शायद महीनों से दबी हुई थी।

अकांक्षा ने ग्लास उठाया और बप्पई की ओर देखते हुए कहा, 'अरे बप्पई, तू तो आज बिल्कुल चुप है। क्या हुआ? कोई गर्लफ्रेंड ने फिर से डंप कर दिया क्या?' उसकी आवाज में मस्ती थी, लेकिन एक तीखापन भी।

बप्पई ने हंसते हुए जवाब दिया, 'अरे भाभी, आप जैसी हॉट और बिंदास लेडी के सामने कौन सी गर्लफ्रेंड टिकेगी? मैं तो बस आपकी तारीफों में खोया हूं!'

अकांक्षा ने एक ठहाका लगाया, 'बस बस, ज्यादा चापलूसी मत कर। वरना अभिलाष को जलन हो जाएगी।' उसने अभिलाष की ओर देखा, जो चुपचाप अपना ग्लास घुमा रहा था। 'क्या हुआ, मिस्टर? आज इतने खामोश क्यों हो?'

अभिलाष ने एक गहरी सांस ली और पहली बार अपनी आवाज में एक तल्खी लाते हुए कहा, 'खामोश तो मैं हमेशा से हूं, अकांक्षा। लेकिन आज शायद ये नशा मुझे कुछ बोलने पर मजबूर कर रहा है।'

अकांक्षा ने भौंहें चढ़ाईं, 'अच्छा? तो बोल ना, क्या कहना चाहता है?'

अभिलाष ने ग्लास टेबल पर रखा और उसकी आंखों में एक आग सी जल रही थी। 'मैं कहना चाहता हूं कि मैं तंग आ गया हूं। ये शादी, ये प्यार, सब एक ढोंग सा लगने लगा है। तू मुझे पास नहीं आने देती, हर बार कोई ना कोई बहाना। लेकिन मेरे अंदर एक आग जल रही है, अकांक्षा। मैं इंसान हूं, मेरी भी जरूरतें हैं।'

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। बप्पई ने असहज होकर ग्लास उठाया और कहा, 'अरे यार, मैं तो चलता हूं। ये पति-पत्नी की बातें हैं।'

अकांक्षा ने उसे रोकते हुए कहा, 'रुक जा, बप्पई। आज सब खुलकर बात करेंगे।' उसने अभिलाष की ओर देखा, उसकी आंखों में गुस्सा और चुनौती थी। 'तो तुझे लगता है मैं तुझे तड़पा रही हूं? अरे, मैं कोई कमजोर औरत नहीं हूं जो बस तेरी हर बात माने। मेरी भी अपनी मर्जी है, अपनी शर्तें हैं। लेकिन अगर तू इतना ही बेकरार है, तो आज देख ले, मैं कितनी आग लगा सकती हूं।'

अभिलाष के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई, लेकिन उसकी आवाज में अब भी गुस्सा था। 'अच्छा? तो आज दिखा दे, अकांक्षा। मैं देखना चाहता हूं कि तू कितनी बिंदास है। मैं महीनों से तरस रहा हूं, और आज ये नशा मुझे रोक नहीं सकता।'

अकांक्षा ने अपना ग्लास नीचे रखा और अभिलाष के पास आई। उसकी सांसों में शराब की महक थी, लेकिन उसकी आंखों में एक जंग थी। 'तो रुक क्यों रहा है? आज मैं तुझे दिखाती हूं कि मैं कितनी जंगली हो सकती हूं। लेकिन याद रख, मैं कोई गुलाम नहीं, मैं तेरे साथ बराबर की पार्टनर हूं।'

अभिलाष ने उसका हाथ पकड़ा और उसे अपनी ओर खींच लिया। 'तो आ जा, आज देखते हैं कौन कितना जलता है।' उसकी आवाज में अब एक हवस भरी थी, और अकांक्षा की सांसें तेज हो रही थीं। कमरे में गर्मी बढ़ रही थी, और बप्पई ने हंसते हुए कहा, 'अरे भाई, मैं तो निकलता हूं। तुम लोग अपनी आग बुझाओ।'

जैसे ही बप्पई बाहर निकला, अभिलाष ने अकांक्षा को सोफे पर धकेल दिया। उसकी सांसें तेज थीं, और उसकी आंखों में एक भूख थी। 'आज मैं रुकने वाला नहीं हूं, अकांक्षा। तूने मुझे बहुत तड़पाया है।'

अकांक्षा ने हंसते हुए कहा, 'तो आ जा, दिखा दे अपनी मर्दानगी। लेकिन याद रख, मैं भी कम नहीं हूं।' उसने अभिलाष की शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए, और कमरे में सिर्फ उनकी तेज सांसों की आवाज गूंज रही थी। नशे और हवस का ये मेल अब एक विस्फोट की ओर बढ़ रहा था।

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