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निषिद्ध आकर्षण

निषिद्ध आकर्षण

अध्याय 1: पहली मुलाकात की चिंगारी

दिल्ली की गर्मियों की एक उमस भरी शाम थी। माया, एक तेज-तर्रार 32 साल की बिजनेसवुमन, अपने ऑफिस से निकलकर एक पुरानी हवेली में आयोजित एक आर्ट प्रदर्शनी में पहुंची थी। उसकी काली साड़ी उसकी कर्व्स को उभार रही थी, और उसकी आंखों में एक आत्मविश्वास था जो किसी को भी अपनी ओर खींच सकता था। वहां उसकी मुलाकात हुई राघव से, एक 35 साल का मूर्तिकार, जिसकी मर्दाना काया और गहरी आंखें किसी को भी बेकरार कर सकती थीं।

माया ने एक मूर्ति को गौर से देखते हुए कहा, 'ये मूर्ति... इसमें इतनी तीव्रता है। क्या तुमने इसे बनाया है, राघव?'

राघव ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, 'हां, माया। ये मेरी रचना है। लेकिन तीव्रता तो तुम्हारी आंखों में भी है। क्या तुम हमेशा इतनी बेबाक रहती हो, या ये सिर्फ मेरे लिए है?'

माया ने हंसते हुए कहा, 'मैं बेबाक नहीं, बस सच बोलती हूं। और सच ये है कि तुम्हारी कला मुझे छू गई है... शायद तुम भी।'

राघव ने एक कदम पास आते हुए कहा, 'तो क्या तुम मेरी कला को और करीब से जानना चाहोगी? मेरी वर्कशॉप में कुछ खास मूर्तियां हैं, जो सिर्फ खास लोगों के लिए हैं।'

माया की आंखों में एक शरारत भरी चमक आई। 'मैं खास हूं, ये तो मैं जानती हूं। लेकिन तुम कितने खास हो, ये देखना बाकी है। चलो, दिखाओ अपनी वर्कशॉप।'

रात के 11 बजे, दोनों राघव की वर्कशॉप में थे। चारों ओर मूर्तियों की छाया थी, और हवा में एक अजीब सी उत्तेजना। माया ने एक मूर्ति को छूते हुए कहा, 'ये मूर्ति इतनी गर्म क्यों लग रही है? या ये मेरी सोच है?'

राघव ने उसकी ओर देखते हुए कहा, 'शायद ये तुम्हारी गर्मी है, माया। मैं तो बस मूर्तियां बनाता हूं, लेकिन तुम... तुम तो आग हो।'

माया ने उसकी ओर मुड़ते हुए कहा, 'तो क्या तुम इस आग को बुझा सकते हो, या सिर्फ बातें बनाना जानते हो?'

राघव ने उसकी कमर पकड़ते हुए उसे अपनी ओर खींच लिया। उसकी सांसें तेज थीं, और माया की आंखों में एक जंगली चाहत। उसने कहा, 'मैं बातें नहीं, हकीकत बनाता हूं।'

उनके होंठ मिलने ही वाले थे, जब माया ने उसे धक्का देकर कहा, 'रुक जाओ। मैं कोई आसान शिकार नहीं हूं। अगर तुम मुझे चाहते हो, तो मुझे जीतना होगा।'

राघव ने हंसते हुए कहा, 'मैं तैयार हूं, माया। ये खेल शुरू हो चुका है।'

उस रात, वर्कशॉप की मद्धम रोशनी में, दोनों के बीच की गर्मी बढ़ती गई। माया की साड़ी का पल्लू सरक रहा था, और राघव की शर्ट के बटन खुल रहे थे। हवा में एक तूफान सा माहौल था, जो किसी भी पल फट सकता था।

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