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निषिद्ध आकर्षण

निषिद्ध आकर्षण

अध्याय 1: चिंगारी की शुरुआत

निशा भाभी रसोई में खड़ी थीं, उनकी साड़ी का पल्लू हल्का सा खिसका हुआ था, और उनकी कमर की उभरी हुई रेखा राहुल की आंखों को चुरा रही थी। राहुल, उनका देवर, किचन के दरवाजे पर खड़ा होकर उन्हें देख रहा था, उसकी नजरें उनकी हर हरकत पर टिकी थीं। निशा ने चूल्हे पर करछी चलाते हुए एक तिरछी नजर राहुल की ओर फेंकी और मुस्कुराई।

'क्या देख रहे हो, राहुल? इतना ध्यान से तो परीक्षा की कॉपी भी नहीं पढ़ी होगी तुमने,' निशा ने तंज कसा, उनकी आवाज में एक शरारती लहजा था।

राहुल ने हल्का सा हंसते हुए जवाब दिया, 'भाभी, कुछ चीजें किताबों से ज्यादा दिलचस्प होती हैं। और आप तो... पूरी किताब ही हो, हर पन्ना नया राज खोलता है।'

निशा ने एक भौंह उठाई, उनकी आंखों में चमक थी। 'अच्छा जी, तो अब तुम राज खोलने वाले बन गए हो? सावधान रहना, कुछ राज जलाने वाले भी होते हैं।' उनकी आवाज में एक गहरा आकर्षण था, जो राहुल के दिल की धड़कन तेज कर गया।

राहुल ने एक कदम आगे बढ़ाया, उसकी नजरें निशा के चेहरे से हटकर उनकी गर्दन पर टिक गईं, जहां एक पसीने की बूंद धीरे-धीरे नीचे सरक रही थी। 'भाभी, जलने का डर तो है, लेकिन आपकी आग में जलने का मजा ही अलग है।'

निशा ने करछी नीचे रखी और राहुल की ओर मुड़ीं, उनकी साड़ी का आंचल हल्का सा लहराया। 'राहुल, ये खेल खतरनाक है। मैं तुम्हारी भाभी हूं, ये भूल मत जाना।' उनकी आवाज सख्त थी, लेकिन आंखों में एक न्योता सा था।

'भाभी, रिश्ते तो इंसान बनाते हैं, लेकिन आकर्षण... वो तो खुद-ब-खुद पैदा हो जाता है,' राहुल ने कहा, उसकी आवाज में एक गहराई थी। वह अब निशा के इतने करीब था कि उसकी सांसें निशा की त्वचा को छू रही थीं।

निशा ने एक गहरी सांस ली, उनकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। 'राहुल, अगर ये आग भड़की, तो बुझाना मुश्किल होगा।'

राहुल ने उनकी कमर पर हल्का सा हाथ रखा, उसकी उंगलियां निशा की गर्म त्वचा को महसूस कर रही थीं। 'तो भड़कने दो, भाभी। मैं तैयार हूं।'

निशा की आंखों में एक तूफान सा उठा, उन्होंने राहुल को धक्का देकर दीवार से सटा दिया। 'तुम्हें लगता है तुम मुझे संभाल लोगे? मैं कोई कमजोर औरत नहीं हूं, राहुल।' उनकी सांसें गर्म थीं, और राहुल का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

राहुल ने मुस्कुराते हुए कहा, 'भाभी, मैं कोशिश तो कर ही सकता हूं।'

निशा ने उसकी कॉलर पकड़ी और उसे अपनी ओर खींचा, उनके होंठ बस कुछ इंच की दूरी पर थे। कमरे में तनाव इतना बढ़ गया था कि हवा भी गर्म लग रही थी। राहुल की नजरें निशा के होंठों पर टिक गईं, और निशा की सांसें तेज हो गईं।

अचानक, निशा ने उसे और करीब खींचा, उनकी उंगलियां राहुल की गर्दन पर फिसल रही थीं। 'राहुल, अगर ये शुरू हुआ, तो रुकना नामुमकिन होगा।'

राहुल की आंखों में एक जुनून सा था, उसने निशा की कमर को और कस लिया। 'तो शुरू कर दो, भाभी। मैं इंतजार में हूं।'

(अगले अध्याय में इस आकर्षण की आग और भड़केगी।)

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