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निषिद्ध आकर्षण: राहुल और निशा की गुप्त रातें

निषिद्ध आकर्षण: राहुल और निशा की गुप्त रातें

अध्याय 1: पहली मुलाकात की आग

घर की छत पर हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रात के ग्यारह बज रहे थे और चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। निशा, राहुल की भाभी, छत पर खड़ी होकर तारों को निहार रही थी। उसकी साड़ी का पल्लू हवा में लहरा रहा था, और उसकी कमर की हल्की झलक राहुल की आँखों में चुभ रही थी। राहुल, जो अभी-अभी कॉलेज से लौटा था, छत पर आया और निशा को देखकर ठिठक गया।

'भाभी, इतनी रात को यहाँ क्या कर रही हो?' राहुल ने हल्के मज़ाकिया लहजे में पूछा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कशिश थी।

निशा ने मुड़कर उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में एक चमक थी। 'क्यों, तुझे क्या परेशानी है? मैं अपनी छत पर खड़ी हूँ, तुझे क्या?' उसने तीखे लहजे में जवाब दिया, लेकिन होंठों पर एक शरारती मुस्कान थी।

राहुल हँसा, 'अरे भाभी, मैं तो बस पूछ रहा था। वैसे, तुम्हें देखकर लगता है कि तारों से ज्यादा चमक तो तुम में है।' उसने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा।

निशा ने भौंहें चढ़ाईं, 'बड़े बनते हो राहुल, मगर ये चिकनी-चुपड़ी बातें मेरे पर काम नहीं करेंगी। समझे?' उसने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में एक हल्की सी कँपकँपी थी।

राहुल अब उसके करीब आ गया था। उसकी साँसें निशा की गर्दन पर महसूस हो रही थीं। 'भाभी, मैं तो बस सच बोल रहा हूँ। तुम्हें देखकर कोई भी पागल हो जाए।' उसकी आवाज़ गहरी हो गई थी।

निशा ने उसे धक्का देने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखों में एक अलग ही आग थी। 'राहुल, ये गलत है। मैं तेरी भाभी हूँ।' उसने कहा, मगर उसकी आवाज़ में दृढ़ता कम और लालसा ज्यादा थी।

'भाभी, गलत-सही तो मन का खेल है। तुम भी तो जानती हो, ये आग दोनों तरफ जल रही है।' राहुल ने उसकी कमर पर हाथ रखते हुए कहा। निशा की साँसें तेज़ हो गईं, उसका शरीर गर्म होने लगा था।

'राहुल, अगर किसी ने देख लिया तो?' निशा ने फुसफुसाते हुए कहा, लेकिन उसने राहुल को दूर नहीं किया।

'कोई नहीं देखेगा, भाभी। बस एक बार... मुझे तुम्हें छूने दो।' राहुल की आवाज़ में एक भूख थी। उसने निशा को अपनी ओर खींचा, और उसकी साड़ी का पल्लू नीचे गिर गया। निशा की साँसें तेज़ हो गईं, उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी।

उसके होंठ राहुल के होंठों के करीब थे। दोनों की साँसें मिल रही थीं। निशा ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं, और राहुल ने मौके का फायदा उठाते हुए उसे चूम लिया। वो चुम्बन इतना गहरा था कि दोनों के शरीर में आग सी लग गई। निशा ने विरोध नहीं किया, बल्कि उसने राहुल को और कसकर पकड़ लिया।

राहुल की उंगलियाँ अब निशा की कमर से नीचे सरक रही थीं, और निशा की साँसें पैंटिंग की तरह तेज़ हो गई थीं। 'राहुल... ये... ये गलत है... मगर रुकना मत।' उसने फुसफुसाया।

राहुल ने उसकी साड़ी को और खींचा, और निशा का शरीर अब पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था। वो गीली हो रही थी, उसकी त्वचा पर पसीना चमक रहा था। राहुल का शरीर भी कठोर हो गया था, उसकी भूख अब बेकाबू थी।

छत की ठंडी हवा में दोनों के गर्म शरीर एक-दूसरे से लिपटने को तैयार थे। अगले ही पल, राहुल ने निशा को दीवार के सहारे धकेल दिया, और दोनों की दुनिया में सिर्फ़ लालसा और आग बाकी रह गई थी।

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