← Story Library

निषिद्ध चाहत की आग

निषिद्ध चाहत की आग

अध्याय 1: पहली मुलाकात की चिंगारी

निशा रसोई में खड़ी थी, उसकी साड़ी का पल्लू हल्का सा खिसका हुआ था, और उसकी कमर की गोलाई साफ दिख रही थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वो किसी गहरे राज को छुपा रही हो। राहुल, उसका देवर, अभी-अभी शहर से लौटा था और घर में कदम रखते ही उसकी नजर निशा पर पड़ी। वो ठिठक गया।

'भाभी, ये क्या? आप तो दिन-ब-दिन और खूबसूरत होती जा रही हो,' राहुल ने मुस्कुराते हुए कहा, उसकी आवाज में एक शरारत भरी चंचलता थी।

निशा ने पलटकर देखा, उसकी भौहें तनी हुई थीं, लेकिन होंठों पर हल्की सी मुस्कान थी। 'राहुल, तमीज से बात करो। मैं तुम्हारी भाभी हूँ, कोई कॉलेज की लड़की नहीं,' उसने ताने मारते हुए कहा, लेकिन उसकी आँखों में एक चुनौती थी।

'अरे भाभी, तमीज तो मैंने सीखी ही है, लेकिन आपकी खूबसूरती के सामने तो तमीज भी हार मान ले,' राहुल ने जवाब दिया, उसकी नजरें निशा के चेहरे से हटकर उसकी कमर पर टिक गईं।

निशा ने उसकी नजर पकड़ ली और एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा, 'देखो राहुल, ये नजरें कहीं और ले जाओ, वरना मैं तुम्हारे भैया को बता दूँगी कि उनका छोटा भाई कितना शरारती हो गया है।' उसकी आवाज में सख्ती थी, लेकिन अंदर ही अंदर वो राहुल की बेबाकी से प्रभावित थी।

'भाभी, भैया को बताने से पहले एक बार सोच लो, कहीं वो भी आपकी इन आँखों में खो न जाएँ,' राहुल ने हँसते हुए कहा और पास आ गया। उसकी साँसें गर्म थीं, और निशा को अचानक एक अजीब सी गर्मी महसूस हुई।

निशा ने खुद को संभाला और कहा, 'बस करो राहुल, ये सब ठीक नहीं है।' लेकिन उसकी आवाज में वो दम नहीं था। राहुल ने उसकी कलाई पकड़ ली, हल्के से, लेकिन इतना कि निशा का दिल धड़क उठा।

'भाभी, ठीक और गलत की बातें तो किताबों में अच्छी लगती हैं, लेकिन इस पल में तो बस हम हैं,' राहुल ने धीमी आवाज में कहा, उसकी नजरें निशा के होंठों पर टिक गईं।

निशा का चेहरा लाल हो गया, वो गुस्से में थी, लेकिन साथ ही एक अजीब सी उत्तेजना भी महसूस कर रही थी। उसने अपनी कलाई छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन राहुल की पकड़ मजबूत थी। 'राहुल, ये हद है,' उसने कहा, लेकिन उसकी साँसें तेज हो रही थीं।

राहुल ने उसे दीवार की ओर धकेल दिया, उसका चेहरा निशा के इतना करीब था कि वो उसकी गर्म साँसें महसूस कर सकती थी। 'भाभी, हद तो मैं पार करने वाला हूँ,' उसने कहा, और उसकी नजरें निशा के गले से नीचे सरकने लगीं।

निशा का शरीर काँप रहा था, गुस्से से या चाहत से, वो खुद नहीं समझ पा रही थी। वो जानती थी कि ये गलत है, लेकिन राहुल की आँखों में वो आग थी, जो उसे अपनी ओर खींच रही थी। उसकी साड़ी का पल्लू अब पूरी तरह से खिसक गया था, और राहुल की नजरें उसकी छाती पर टिक गईं।

'राहुल, रुक जाओ,' निशा ने कहा, लेकिन उसकी आवाज में एक कमजोरी थी। राहुल ने उसकी कमर पर हाथ रखा, और उसे अपनी ओर खींच लिया। उसकी साँसें तेज थीं, और निशा को लग रहा था कि वो अब खुद को नहीं रोक पाएगी।

(अगले अध्याय में इस निषिद्ध आकर्षण की आग और भड़केगी, जब राहुल और निशा अपनी चाहतों के आगे हार मान लेंगे।)

Want to know how it ends?

This is just the opening chapter. Continue the saga — or write a steamy tale starring you.