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ट्रेन की रात: एक अनजान की चाहत

ट्रेन की रात: एक अनजान की चाहत

अध्याय 1: मुलाकात की शुरुआत

रात के ग्यारह बज रहे थे। ट्रेन की सीट पर बैठी राधिका अपनी लंबी, घनी जुल्फों को बार-बार संवार रही थी। उसकी आंखों में एक अजीब सी बेचैनी थी, शायद सफर की थकान या फिर कुछ और। उसकी उम्र कोई 35 के आसपास होगी, लेकिन उसकी काया और चेहरे की रौनक किसी 25 साल की लड़की को मात देती थी। उसकी साड़ी का पल्लू हल्का सा सरक रहा था, जिससे उसकी गहरी नाभि और कमर की लचक साफ नजर आ रही थी। सामने की सीट पर बैठा एक अनजान मर्द, वीरेंद्र, उसकी हर हरकत को गौर से देख रहा था। उसकी नजरें राधिका के चेहरे से लेकर उसकी कमर तक भटक रही थीं, और वह खुद को रोक नहीं पा रहा था।

'क्या बात है, भाईसाहब? इतना घूर क्यों रहे हो? कुछ चाहिए क्या?' राधिका ने तीखे लहजे में पूछा, उसकी आवाज में एक ठंडी सख्ती थी।

वीरेंद्र हड़बड़ाया, लेकिन फिर मुस्कुराते हुए बोला, 'अरे मैडम, घूरना तो नहीं चाहता था, लेकिन आपकी खूबसूरती ऐसी है कि नजरें हटती ही नहीं।'

राधिका ने भौंहें चढ़ाईं, 'अच्छा? तो ये आपकी तारीफ है या बहाना? मैं शादीशुदा हूं, ये याद रखिए।'

'शादीशुदा होना तो कोई अपराध नहीं, मैडम। और मैं तो बस आपकी तारीफ कर रहा हूं। अगर बुरा लगा हो तो माफी मांग लेता हूं,' वीरेंद्र ने बड़े ही शातिर अंदाज में कहा, उसकी आंखों में एक चमक थी।

राधिका ने हल्की सी हंसी हंसी, 'माफी मांगने की जरूरत नहीं। लेकिन अपनी नजरें काबू में रखो, वरना मैं भी अपनी जुबान काबू में नहीं रखूंगी।'

'आपकी जुबान तो पहले ही काफी तीखी है, मैडम। लेकिन मुझे तीखा पसंद है,' वीरेंद्र ने पलटवार किया, उसकी आवाज में एक शरारत थी।

राधिका ने उसकी ओर देखा, उसकी आंखों में एक चुनौती थी। 'देखो, ज्यादा स्मार्ट बनने की कोशिश मत करो। मैं वो औरत नहीं हूं जो तुम्हारी बातों में आ जाए।'

'मैं भी वो मर्द नहीं हूं जो हर औरत को अपनी बातों में फंसा ले, लेकिन आप... आप में कुछ अलग बात है। आपकी आंखों में एक आग है, जो मुझे अपनी ओर खींच रही है,' वीरेंद्र ने धीमी आवाज में कहा, उसका लहजा अब गंभीर हो गया था।

राधिका चुप हो गई। उसकी सांसें हल्की सी तेज हो गई थीं। ट्रेन की हल्की सी झटकों के साथ उसका दिल भी धड़क रहा था। वह जानती थी कि ये गलत है, लेकिन वीरेंद्र की बातों में एक अजीब सी कशिश थी। वह अपनी सीट पर थोड़ा सा हिली, उसकी साड़ी का पल्लू फिर से सरक गया, और इस बार उसने उसे ठीक नहीं किया।

वीरेंद्र ने उसकी हरकत को नोटिस किया। उसने धीरे से कहा, 'मैडम, आपका पल्लू...'

'तुम्हें मेरे पल्लू से इतनी परेशानी क्यों हो रही है? अपनी नजरें कहीं और ले जाओ,' राधिका ने तंज कसा, लेकिन उसकी आवाज में अब वो सख्ती नहीं थी।

'नजरें तो मैं कहीं और ले जाऊं, लेकिन दिल कहां ले जाऊं?' वीरेंद्र ने कहा, उसकी आवाज में एक गहराई थी।

राधिका ने उसकी ओर देखा, उसकी आंखों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी उलझन थी। ट्रेन का डिब्बा अब लगभग खाली हो चुका था। रात गहरा रही थी, और हवा में एक अजीब सी गर्मी थी। वीरेंद्र धीरे से अपनी सीट से उठा और राधिका के पास आकर बैठ गया।

'ये क्या कर रहे हो? अपनी जगह पर जाओ,' राधिका ने कहा, लेकिन उसकी आवाज में अब वो ताकत नहीं थी।

'बस दो मिनट, मैडम। मैं कुछ कहना चाहता हूं,' वीरेंद्र ने कहा, उसकी सांसें अब तेज हो रही थीं।

राधिका ने कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप उसकी ओर देखती रही। वीरेंद्र ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा, और राधिका ने उसे छुड़ाने की कोशिश नहीं की। उसकी सांसें अब और तेज हो गई थीं। वीरेंद्र का हाथ अब उसकी कमर की ओर बढ़ रहा था, और राधिका की आंखें बंद हो रही थीं। ट्रेन की हल्की सी गति के साथ उनका तनाव बढ़ रहा था।

'ये गलत है,' राधिका ने धीमी आवाज में कहा, लेकिन उसकी आवाज में अब कोई विरोध नहीं था।

'गलत तो वो होता है जो दिल को तकलीफ दे, मैडम। ये तो बस एक पल की चाहत है,' वीरेंद्र ने कहा, उसकी आवाज में एक गहरी लालसा थी।

राधिका की सांसें अब पैंटिंग की तरह हो गई थीं। उसका शरीर गर्म हो रहा था, और वह खुद को रोक नहीं पा रही थी। वीरेंद्र का हाथ अब उसकी साड़ी के नीचे सरक रहा था, और राधिका की आंखें अब पूरी तरह बंद हो गई थीं। ट्रेन की हल्की सी आवाज के बीच उनका तनाव चरम पर पहुंच रहा था। वह पल अब दूर नहीं था जब उनकी चाहतें एक-दूसरे में समा जाएंगी।

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