अध्याय 1: अनजानी मुलाकात
सुधा, 43 साल की एक परंपरागत पतिव्रता पत्नी, अपने पति रमेश के साथ एक रोमांचक ट्रिप की योजना बना रही थी। लेकिन अचानक रमेश के ऑफिस में काम का दबाव बढ़ गया और उन्हें वापस लौटना पड़ा। सुधा ने अकेले ही इस ट्रिप को जारी रखने का फैसला किया। हिमाचल की ठंडी वादियों में, जहाँ हवा में बर्फ की सिहरन थी, उसने खुद को अकेला महसूस किया, लेकिन तभी उसकी मुलाकात हुई अपने बेटे के दोस्त, 20 साल के युवा और चतुर अर्जुन से।
अर्जुन, लंबा, आकर्षक और तेज-तर्रार, अपनी कॉलेज की छुट्टियों में यहाँ घूमने आया था। पहली मुलाकात में ही उसकी हाजिरजवाबी ने सुधा को प्रभावित कर दिया। एक छोटे से कैफे में कॉफी पीते हुए, उनकी बातचीत शुरू हुई।
'आंटी, आप अकेले यहाँ? अंकल कहाँ हैं?' अर्जुन ने मुस्कुराते हुए पूछा।
'बस, काम का बोझ... रमेश को वापस जाना पड़ा। मैंने सोचा, क्यों न अकेले ही थोड़ा घूम लूँ,' सुधा ने हल्की उदासी के साथ जवाब दिया।
'अरे, अब आप अकेली कहाँ हैं? मैं हूँ ना! चलिए, मैं आपको बेस्ट स्पॉट्स दिखाता हूँ। वैसे भी, आप जैसी खूबसूरत महिला को अकेले घूमते देखकर तो पहाड़ भी शरमा जाएँगे,' अर्जुन ने चुटकी लेते हुए कहा।
सुधा हँस पड़ी, उसकी तारीफ से उसका चेहरा लाल हो गया। 'बस-बस, ज्यादा चापलूसी मत करो। मैं तुम्हारी माँ की उम्र की हूँ।'
'माँ की उम्र की? अरे आंटी, आप तो मेरी किसी क्रश से कम नहीं लगतीं। आपकी ये मुस्कान, ये स्टाइल... मैं तो फिदा हो गया,' अर्जुन ने आँख मारते हुए कहा।
सुधा ने उसे हल्के से डाँटा, लेकिन मन ही मन उसकी बातों से एक अजीब-सी गुदगुदी महसूस हो रही थी। सालों बाद किसी ने उसे इस तरह तारीफ की थी। रमेश तो हमेशा काम में व्यस्त रहते थे, उनकी जिंदगी में रोमांस कब का खत्म हो चुका था।
दिन बीतते गए, और दोनों की बातचीत गहरी होती गई। अर्जुन ने सुधा को अपनी जिंदगी के सपने बताए, और सुधा ने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों और रमेश के काम के दबाव की बातें साझा कीं। अर्जुन ने उसका साथ दिया, उसकी बातें सुनीं, और उसे हँसाया। सुधा को पहली बार लगा कि कोई उसे समझ रहा है।
ट्रिप के आखिरी दिन, जब वे एक सुनसान पहाड़ी रास्ते पर सूर्यास्त देख रहे थे, अर्जुन ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया। 'आंटी... सुधा जी, मैं जानता हूँ कि ये गलत है, लेकिन मैं आपको पसंद करने लगा हूँ। आपकी हर बात, आपकी हर अदा... मैं आपके बिना नहीं रह सकता।'
सुधा ने झटके से अपना हाथ छुड़ाया, उसकी आँखों में गुस्सा और उलझन थी। 'अर्जुन, ये क्या बकवास है? मैं शादीशुदा हूँ, तुम्हारे दोस्त की माँ हूँ। ये सब गलत है।'
'गलत? गलत तो वो है जो आपको हर दिन अकेला छोड़ देता है। मैं आपको वो खुशी दे सकता हूँ जो आपको सालों से नहीं मिली,' अर्जुन ने गहरी नजरों से कहा।
सुधा का दिल तेजी से धड़क रहा था। उसने खुद को संभाला और वहाँ से चली गई, लेकिन अर्जुन की बातें उसके दिमाग में गूँज रही थीं। रात को होटल के कमरे में, जब वह अकेली थी, उसकी साँसें तेज थीं। उसने खुद को आईने में देखा, उसकी आँखों में एक अजीब-सी चाहत थी। सालों से दबी हुई इच्छाएँ जाग रही थीं।
अगले दिन, जब वे वापस लौट रहे थे, अर्जुन ने फिर से उससे बात करने की कोशिश की। बस की स्लीपर कम्पार्टमेंट में, जब रात गहरी हो गई थी, अर्जुन ने धीरे से उसका हाथ छुआ। 'सुधा जी, बस एक बार मुझे मौका दो। मैं जानता हूँ, आप भी मुझे चाहती हैं।'
सुधा ने मना करने की कोशिश की, लेकिन उसकी आवाज में हिचकिचाहट थी। 'अर्जुन, ये गलत है... मैं... मैं नहीं कर सकती।'
लेकिन अर्जुन ने धीरे से उसके गाल को छुआ, और उसकी आँखों में देखा। 'बस एक बार, सुधा। सिर्फ एक बार।' उसकी गर्म साँसें सुधा के चेहरे पर महसूस हो रही थीं। सुधा की साँसें तेज हो गईं, उसका शरीर काँप रहा था। अर्जुन ने धीरे से अपने होंठ उसके होंठों के पास ले गए, और एक हल्का-सा चुम्बन दे दिया।
सुधा ने एक पल के लिए खुद को रोकने की कोशिश की, लेकिन फिर वह खुद को रोक न सकी। उसने अर्जुन को अपनी ओर खींच लिया और एक गहरा, जुनूनी चुंबन कर लिया। उसकी साँसें तेज थीं, उसका शरीर गर्म हो रहा था। अर्जुन की मजबूत बाहों में वह खुद को खो रही थी।
'अर्जुन... ये गलत है... लेकिन मैं रुक नहीं सकती,' सुधा ने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी आवाज में एक अजीब-सी प्यास थी।
'रुकना भी नहीं चाहिए, सुधा। आज रात हम सिर्फ एक-दूसरे के हैं,' अर्जुन ने कहा, उसकी आँखों में एक जंगली आग थी।
उनके बीच की दूरी खत्म हो रही थी, और बस की अंधेरी स्लीपर कम्पार्टमेंट में, उनकी साँसों की गर्मी बढ़ रही थी। सुधा का मन उलझन में था, लेकिन उसका शरीर बेकाबू हो रहा था। क्या वह इस आग में जल जाएगी, या इसे बुझा देगी? ये तो आने वाला समय ही बताएगा।
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