← Story Library

गरबा की रातों की आग

गरबा की रातों की आग

पहली रात: आगाज़ की शुरुआत

गरबा की पहली रात थी। रंग-बिरंगे लहंगे और चनिया-चोली में सजी औरतें, ढोल की थाप पर थिरकती हुईं, माहौल में एक अलग ही जादू बिखेर रही थीं। मैंने अपनी मां, रेखा, को साथ लिया था। 42 साल की उम्र में भी उनकी खूबसूरती देखते ही बनती थी। उनका लाल लहंगा उनकी गोरी रंगत पर ऐसा लग रहा था मानो आग का गोला हो। लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता थी, जैसे वो अपने दिल की बातों को छुपाए बैठी हों।

मेरा दोस्त, वीर, भी वहां था। 28 साल का जवान, लंबा-चौड़ा, और बातों का ऐसा जादूगर कि किसी को भी हंसा दे। उसने मां को देखते ही मुझे कनखियों से देखा और मुस्कुराया। 'अरे यार, तेरी मम्मी तो कमाल की हैं। आज रात तो मैं इनका दिल जीत ही लूंगा,' उसने फुसफुसाते हुए कहा।

मैंने हंसते हुए कहा, 'देख भाई, मां को तू ऐसे मत देख। वो पुराने ख्यालों वाली हैं, तेरी बातों में नहीं आएंगी।'

'अरे, देख लेना। मैं तो बस थोड़ा सा गरबा सिखाने के बहाने पास आऊंगा,' वीर ने पलक मारते हुए कहा।

मैंने कंधे उचकाए और उसे छोड़ दिया। मां उस वक्त एक कोने में खड़ी थीं, बस तालियां बजा रही थीं। वीर धीरे से उनके पास गया और बोला, 'अरे रेखा जी, आप इतनी खूबसूरत लग रही हैं और बस कोने में खड़ी हैं? चलिए, मैं आपको गरबा सिखा देता हूं।'

मां ने एक ठंडी नजर से उसे देखा और कहा, 'मुझे गरबा आता है, वीर। मैं बस मूड में नहीं हूं।'

'अरे, मूड तो मैं बना दूंगा। बस एक बार हाथ थाम लीजिए, ढोल की थाप खुद आपको नचा देगी,' वीर ने अपनी चिर-परिचित शरारती मुस्कान के साथ कहा।

मां ने हल्का सा मुस्कुराया, लेकिन उनकी आंखों में एक चमक थी जो शायद वो छुपाना चाहती थीं। 'तुम बहुत बातें करते हो, वीर। ठीक है, एक राउंड गरबा हो जाए,' उन्होंने कहा और मैदान में आ गईं।

दोनों ने गरबा शुरू किया। वीर जानबूझकर उनके करीब आ रहा था, उसकी उंगलियां बार-बार मां के हाथों को छू रही थीं। मैं दूर से देख रहा था, मां के चेहरे पर हल्की सी लाली छा रही थी। शायद वो गर्मी थी, या शायद कुछ और। वीर ने उनके कान के पास झुककर कहा, 'रेखा जी, आपकी हर अदा में आग है। ये लहंगा तो बस बहाना है, असली आग तो आपके अंदर छुपी है।'

मां ने उसे घूरते हुए कहा, 'वीर, अपनी जुबान संभालो। मैं तुम्हारी मां की उम्र की हूं।'

'अरे, उम्र तो बस एक नंबर है। दिल तो अभी भी जवान लगता है,' वीर ने हंसते हुए कहा।

मां ने कुछ नहीं कहा, बस गरबा की रफ्तार बढ़ा दी। उनकी सांसें तेज हो रही थीं, पसीना उनके माथे पर चमक रहा था। वीर की नजरें उनकी हर हरकत पर थीं, जैसे वो उनके हर इशारे को पढ़ रहा हो। रात गहराने लगी थी, और माहौल में एक अजीब सी तपिश थी। मैं समझ गया कि ये सिर्फ गरबा की गर्मी नहीं, बल्कि कुछ और भी है जो धीरे-धीरे पनप रहा है।

(अगली रातों की कहानी के लिए, बताइए कि वीर और रेखा के बीच का रिश्ता कैसे आगे बढ़े? क्या रेखा अपने अरमानों को और छुपाएंगी या धीरे-धीरे खुलेंगी? डिटेल में बताएं।)

Want to know how it ends?

This is just the opening chapter. Continue the saga — or write a steamy tale starring you.