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शहवत की आग

शहवत की आग

अध्याय 1: मुलाकात की पहली चिंगारी

मैं, कुबरा खान, एक ऐसी औरत हूं जिसकी खूबसूरती की चर्चा गांव के हर कोने में है। गोरी रंगत, लंबी कद-काठी, और मखमली आवाज़—मगर मेरी ज़िंदगी की हकीकत इन खूबसूरत शब्दों से कोसों दूर है। मेरा शौहर, एक बड़ा आलिम, शूरा का हिस्सा, मगर उसकी चारदीवारी के अंदर एक क्रूर इंसान। उसकी तीन बीवियां, और मैं तीसरी। न बच्चे हुए पहली दो से, न उसमें वो ताकत है, मगर इल्ज़ाम हम पर। हर दिन ताने, मार-पीट, और गालियां—मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।

एक दिन, जब मैंने उससे अपनी कमज़ोरी जांचने को कहा, उसका अहंकार आग बनकर मुझ पर बरसा। उसने मुझे इतना मारा कि मेरे जिस्म पर नीले निशान उभर आए, दर्द से मैं कराह उठी। मगर मैं चुप नहीं रह सकी। दर्द जब हद से गुज़र गया, मैंने हिम्मत जुटाई और हॉस्पिटल पहुंची। चेहरा नकाब में छुपाए, मैं डॉक्टर ध्रुव राठौर के सामने खड़ी थी।

ध्रुव, एक नौजवान, खूबसूरत, लंबा, और कसरती जिस्म का मालिक। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी, जो मुझे बेचैन कर गई। उसने पूछा, 'क्या तकलीफ है, बीबी जी?' मैंने बस इतना कहा, 'जिस्म में दर्द है।' मैं सच नहीं बोल सकी। उसने मुझे कुछ दवाइयां दीं, मगर मेरी झूठी बातों का नतीजा ये हुआ कि दर्द बढ़ता गया, और बुखार ने मुझे जकड़ लिया।

कई दिन बाद, जब मैं बमुश्किल खुद को घसीटते हुए फिर हॉस्पिटल पहुंची, ध्रुव ने मुझे देखते ही कहा, 'तुम फिर आई हो? अबकी बार सच बोलो, कुबरा। मैं डॉक्टर हूं, तुम्हारी मदद करना मेरा काम है।' उसकी आवाज़ में सख्ती थी, मगर एक अजीब सी गर्माहट भी। मैंने हिचकिचाते हुए कहा, 'मुझे... मुझे मार पड़ी है। मेरे शौहर ने...' मेरी आवाज़ टूट गई।

ध्रुव की भौंहें सिकुड़ गईं। 'ये कोई मर्दानगी नहीं, कुबरा। तुम्हें चुप नहीं रहना चाहिए।' उसने मुझे पास बुलाया, और कहा, 'मुझे तुम्हारे जिस्म पर निशान देखने होंगे। मैं तुम्हें ठीक करना चाहता हूं।' उसकी बातों में एक अजीब सी कशिश थी। मैंने नकाब हटाया, और उसकी नज़रें मेरे चेहरे पर टिक गईं। 'तुम... इतनी खूबसूरत हो, कुबरा। फिर भी इतना दर्द क्यों सह रही हो?' उसकी आवाज़ में एक हल्की सी कंपन थी।

उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा, और मैं सिहर उठी। 'मुझे तुम्हारी हर तकलीफ दूर करनी है,' उसने कहा, और उसकी उंगलियां मेरे निशानों पर फिरीं। मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसकी छुअन में दर्द नहीं, बल्कि एक अजीब सी गर्मी थी। 'ध्रुव, ये गलत है,' मैंने कहा, मगर मेरी आवाज़ में वो ताकत नहीं थी।

'गलत वो है जो तुम्हारे साथ हो रहा है, कुबरा। मैं तुम्हें सिर्फ ठीक नहीं करना चाहता, मैं तुम्हें वो सुख देना चाहता हूं जो तुमने कभी महसूस नहीं किया।' उसकी आंखों में शहवत की चिंगारी साफ दिख रही थी। मैंने खुद को रोकने की कोशिश की, मगर मेरे जिस्म में एक आग सी भड़क रही थी।

उसने मुझे अपनी ओर खींचा, और मेरे होंठों के पास आकर रुक गया। 'बोलो, कुबरा, क्या तुम भी ये चाहती हो?' उसकी सांसें मेरे चेहरे पर टकरा रही थीं। मैंने कुछ नहीं कहा, बस मेरी आंखों ने हामी भर दी। उसका हाथ मेरी कमर पर फिसला, और मैंने महसूस किया कि मेरा जिस्म अब मेरे काबू में नहीं।

(जारी रहेगा...)

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